Badi Mushkil Se Biwi Ko Teyar Kiya – Part 16

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iloveall 2017-02-17 Comments

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आगे की कहानी अनीता की जुबानी..

मैं बचपन से ही पढाई में गंभीर थी और खेलों में भी सक्रीय थी। मेरी मम्मी पहले से ही मुझे और मेरी छोटी बहन को यह सिख देती आ रही थी की यदि हमने पढाई में ध्यान नहीं दिया तो हमें आगे चलकर बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। मेरी मम्मी भी अपने स्कूली जीवन में एक खेलाड़ी थी। वह लड़कियों के शारीरिक खेल जैसे कबड्डी, फुटबॉल इत्यादि में जिला चैंपियन रह चुकी थी।

मरे स्कूल और कॉलेज में भी मैं पढ़ाई एवं खेल में सब लड़कियों में आगे रहती थी। यही कारण था की कॉलेज में मैं एक अल्हड लड़की मानी जाती थी। दिखने में मैं सुन्दर तो थी ही। मेरी मम्मी कश्मीर से थी और पप्पा पंजाबी थे। तो मुझे माँ की सुंदरता और नजाकत और पप्पा की शारीरिक विशेषताएं और लंबाई वंशानुगत रूप में मिली थी। हमारी यूनिवर्सिटी में मैं मिस यूनवर्सिटी भी चुनी गयी थी।

मेरे कॉलेज में बहुत सारे लड़के मेरे दीवाने थे। पर मैं उनकी और देखती भी नहीं थी। माँ कहती थी की लड़कियों को अपना चरित्र सम्हालना पड़ता है। पर जब मैंने पहली बार अनिल को देखा तो जैसे मेरे पॉँव ढीले पड़ गए। अनिल न सिर्फ लंबा, गठीले शरीर वाला, फुर्तीला और आकर्षक था, पर उसमें कुछ ऐसी बात थी जो और लड़कों में नहीं थी। कॉलेज में वह मुझसे तीन साल आगे था।

हमारी मुलाकात पहली बार कॉलेज में चर्चा स्पर्धा में हुई। चर्चा स्पर्धा का विषय था “जब पडोशी देशों के बिच यदि कड़ी मत भिन्नता हो और उन दोनों में से एक देश बार बार यदि संघर्ष पर उतारू होता है, तो दूसरे देश के लिए क्या युद्ध ही एक मात्र समाधान रहता है?”

विषय गंभीर था। हम दोनों प्रतिद्वंद्वी थे। चर्चा स्पर्धा में लड़कों में वह प्रथम आया और लड़कियों में मैं। तब फिर हमारे बिच स्पर्धा हुई। उसमें मैंने उसे जब पराजित कर दिया तो नाराज होने के बजाय सबसे ज्यादा तालियां उसने बजायी और सब उपस्थित लोगों के सामने यह माना की मेरे तर्क वितर्क उससे कहीं ज्यादा सटीक और सही थे। मुझे पदक जितने से उतनी ख़ुशी नहीं हुई जीतनी के अनिल की सराहना से। उसने मुझे पहली मुलाकात में ही अपनी सरलता और विनम्रता से जित लिया।

फिर तो हमारी मुलाक़ात नियमित रूप से होने लगी। पढाई में भी वह आगे रहता था। धीरे धीरे हमारी करीबियां बढती गई। एक बार जब मुझे वह अपनी बाइक पर छोड़ने आया तब मैंने उसे अपने घर के अंदर बुलाया और मम्मी पप्पा से भी मिलाया। उस समय तक मेरे मनमें अनिल के प्रति एक दोस्त के अनुरूप ही भाव था। यह कहानी आप देसी कहानी डॉट नेट पर पढ़ रहे है..

अनिल ने ग्रेजुएशन के बाद मास्टर्स भी उसी कॉलेज में किया और हमारी मुलाकातों का दौर जारी रहा. पढाई में भी मैं उससे कभी कभी सहायता लेने लगी। मैंने अनुभव किया की धीरे धीरे अनिल को मेरी और शारीरिक आकर्षण हो रहा था। खैर मैं भी उसकी और आकर्षित हो रही थी, पर वह मुझसे शारीरिक स्पर्श करने के लिये बड़ा उत्सुक रहता था। हम जब साथ साथ बैठते थे तो वह मुझसे सटकर बैठता था। कई बार वह मेरे शरीर को जैसे अनजाने में ही छू लिया हो ऐसे छूता था। मुझे वह अच्छा लगने लगा पर साथ साथ में यह भी डर लग रहा था की कहीं वह और आगे न बढे।

मैं यह मानूँगी की मेरे बदन में भी कुछ ज्यादा ही रोमांच और उत्तेजना के भाव पनप रहे थे। पर माँ की सिख थी की लड़कों के साथ हमें बड़ा सतर्क रहना पड़ेगा की कहीं वह हमारे गुप्त अंगों को छूने या उनसे खेलने की कोशिश न करे। मैं ऐसी परिस्थिति में या तो उठ खड़ी हो जाती या फिर बात को पलट कर वहां से खिसक जाती। पर जब मैं उसके चेहरे पर निराशा के भाव देखती तो मुझे भी बुरा लगता था। जब मैं लड़की हो कर उत्तेजना अनुभव कर रहीथी तो वह तो लड़का था। उसे ज्यादा उत्तेजना होना स्वाभाविक था यह मैं भलीभांति समझती थी।

और इसी कारण कई बार मैं अपने दिमाग और मन के संघर्ष में फंस जाती थी और अनिल के कामुकता पूर्ण स्पर्श का विरोध नहीं कर पाती थी। अनिल ने कई बार मेरी छाती पर हाथ रखा और मेरे स्तनों को मेरे कुर्ते के ऊपर से मसला भी। पर मैंने उसे इससे आगे नहीं बढ़ने दिया। वह मेरे स्तनों को देखना चाहता था। मैं उसे छूने देती थी पर कुर्ती के ऊपर से ही। हम लोग कई बार पार्क मैं बैठ बातें करते और एक दूसरे के हाथोँ में हाथ डाले घूमते थे। अनिल ने कई बार मेरा हाथ अपने पाँवोँ के बिच में रखने की कोशिश की और मैं उसे झटका कर हटा देती थी। पर उसके चेहरे की निराशा देख मुझे बुरा भी लगता था।

एक बार जब एक दिन हमारे ग्रुप ने (जिसमे अनिल भी था) पिकनिक का प्रोग्राम बनाया। हम सब शहर से करीब बिस किलोमीटर दूर एक बड़ा पार्क था वहां पिकनिक मनाने गए। वह बहुत बड़ा था और उसमें झरने, घना वन और छोटी पहाड़ियां होने के कारण बड़ा मनोरम्य था। सारे कॉलेज, स्कूल और ऑफिस चालू होने के कारण पार्क खाली था और हमें ऐसे लग रहा था जैसे सारा पार्क ही हमारा था। अनिल ने तब सुझाव दिया की हम सब वह छोटे पहाड़ पर चढ़ कर वापस आएं। ज्यादातर लड़के लड़कियां तो डांस और संगीत में मस्त थे और नहीं आये। पर मैं, अनिल और एक और लड़का और दो लड़कियां साथ में चल पड़ी। थोड़ा चलने के बाद एक तीखी चढ़ाई जब आयी तो लड़कियां थक गयीं और वापस चली गयीं ।

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